Monday, April 27, 2009

राजा नल व दमयन्ती

कुन्दनपुरी का इतिहास बताता है कि सतयुग में इस तपोभूमि पर कई महान शक्तियों ने अवतार लेकर समस्त मानव-जाति का समय-समय पर मार्गदर्शन एवं उद्धार किया है। इसी श्रृखला में, सतयुग में महानगरी कुन्दनपुरी के प्राँगण में एक अत्यन्त शक्तिशाली, दानशील व सत्यवादी राजा हुए हैं। इनका नाम राजा भीम सिगर था। इनके तीन पुत्र तथा एक पुत्री थी। इनकी रानी का नाम अशोक सुन्दरी था जो एक अत्यन्त धर्मिक-प्रवृत्ति की पतिव्रता नारी थी। पुत्रों के नाम थे दम, दान्त और दमन। ‘दम’ नाम इसलिये पड़ा क्योंकि उसने अपने मन पर पूर्ण-रूप से अधिकार कर लिया था। वह ‘मन’ के पीछे नहीं चलता था बल्कि वह ‘मन’ को अपने पीछे चलाता था। ‘दान्त’ नाम इसलिए पड़ा क्योंकि उसने सामने बड़े-बड़े ‘दैत्य’ आकर झुकते थे। राजा का ‘राज्य’ भूपटल पर पूर्ण-रूप से विख्यात था कि ये राजा ‘मन’ के पीछे नहीं भागते जबकि बड़े-बड़े राजा मन के पीछे भागते थे। ये महान शक्तिशाली व तेजस्वी राजा हुए हैं। ‘दमन’ नाम इसलिये पड़ा क्योंकि उसने बाल्यावस्था से ही पूर्ण-रूप से अपनी इन्द्रियों को वश में कर लिया था। इसलिए प्रजा की दृष्टि में वे ईश्वर के तुल्य पूज्यनीय हो गए थे। ये ही तो इनके तप व तेज का प्रभाव था। राजा भीम सिगर की पुत्री ‘दमयन्ती’ इतनी सुन्दर, सुशील और कीर्तिवान थी कि इन्द्रादि देवता भी उससे विवाह के लिये उत्सुक रहते थे। उसी काल में निषध् देश में महाश्रेष्ठ राजा ‘प्रथम’ के यहाँ राजकुमार ‘नल’ ने जन्म लिया जो आगे चलकर महान गुणवान तथा शीलवान राजा प्रसिद्ध हुआ। राजा नल बड़े प्रतापी राजा थे। राजधानी कुन्दनपुरी से निषध् देश को आने-जाने वाले याचकों से एक-दूसरे के गुणों की प्रशंसा सुनकर राजा नल तथा दमयन्ती के हृदय में परस्पर ‘अनुराग’ उत्पन्न हो गया। ये अनुराग बढ़ते-बढ़ते इतना प्रबल हो गया कि वह अपनी सीमा को भी लाँघ गया। जब राजा भीम सिगर ने देखा कि उनकी कन्या, विवाह के योग्य हो गई है तो उन्होंने पुत्री ‘दमयन्ती’ का स्वयंवर रचाने का निश्चय किया। राजमहल से देश-विदेश में इसकी घोषणा करा दी गयी व निमंत्राण भेज दिये गये।स्वयंवर का समाचार पाकर दूर-दूर के नरेश ‘कुन्दनपुरी’ पधारने लगे। निषध देश के राजा ‘नल’ ने भी इस स्वयंवर के लिये प्रस्थान किया। उधर देवलोक से राजा इन्द्र, वरुण, अग्नि तथा यम-देवता भी ‘दमयन्ती’ को प्राप्त करने के लिये चल दिये। देवताओं को भली-भाँति विदित था कि दमयन्ती, राजा ‘नल’ को चाहती है। स्वयंवर के लिए आते समय मार्ग में सूर्य के समान कीर्तिवान अति-सुन्दर राजा ‘नल’ के तेज को देखकर देवतागण आश्चर्यचकित रह गये। मध्य-मार्ग में ही वे राजा नल के पास गये और बोले कि राजन! सुना है आपकी सत्यवृत्ति की पताका आकाश में लहराती है। क्या इस स्वयंवर में आप हमारी सहायता के लिये हमारा दूत बनना स्वीकार करेंगे? राजा नल ने देवताओं का आग्रह स्वीकार कर लिया। देवताओं ने राजा की परीक्षा लेते हुए कहा कि हे राजन्! आप हमारे दूत के रूप में दमयन्ती से जाकर कहिए कि हम लोग उससे विवाह करना चाहते हैं। अतः हम में से वह किसी को भी अपना पति चुन ले। राजा नल ने नम्रता-पूर्वक कहा कि हे देवलोक वासियो! आप लोग जिस उद्देश्य से दमयन्ती के पास जा रहे हैं, उसी उद्देश्य से मैं भी उसके पास जा रहा हूँ अतः वहाँ मेरा, आपका दूत बनकर जाना उचित नहीं है। देवतागण कहने लगे कि हे राजन्! आप पहले ही हमारा दूत बनना स्वीकार कर चुके हैं। अतः अब आप अपनी मर्यादा को तजकर अपना वचन असत्य ना करें। राजा नल को देवताओं का आग्रह स्वीकार करना पड़ा। साथ ही साथ इन्द्र ने राजा नल को वरदान दिया कि दमयन्ती-स्वयंवर में प्रविष्ट होते समय आपको द्वारपाल आदि भी न देख सकेंगे, इससे आप सहज ही राजमहल में प्रवेश कर जायेंगे।तत्पश्चात् राजा नल, दमयन्ती के भवन में पहुँच गये। दमयन्ती तथा उसकी सखियाँ परम-सुन्दर युवा-पुरुष को अपने समीप आया देखकर आश्चर्य-चकित रह गयीं। वो अपनी सुध-बुध् ही खो बैठीं। राजा नल ने दमयन्ती से अपना परिचय देकर कहा कि हे देवी! मैं इन्द्र, वरुण, यम और अग्नि-देवता का दूत बनकर आपके पास आया हूँ। ये देवतागण आपसे विवाह करना चाहते हैं, अतः आप इनमें से किसी को भी अपना ‘वर’ चुन सकती हैं। दमयन्ती ने राजा नल का परिचय पाकर कहा कि हे नरेन्द्र! मैं तो पहले ही अपने मन में आपको अपना ‘वर’ मान चुकी हूँ। मैंने आपके चरणों में अपना सर्वस्व समर्पित कर दिया है। अतः कृपया अब आप अपनी इस तुच्छ दासी को, अपने चरणों में स्थान दीजिये। यदि आप मुझे स्वीकार नहीं करेंगे तो मैं विष खाकर या आग में जलकर अथवा जल में डूबकर या फिर फांसी लगाकर अपने ‘प्राण’ त्याग दूंगी। राजा नल ने बड़ी सच्चाई से ‘दूत’ के कर्तव्य का पालन किया। वो अपने कर्तव्य पर अडिग रहे। यद्यपि वे स्वयं दमयन्ती को चाहते थे, फिर भी उन्होंने देवगणों के ऐश्वर्य, प्रभाव आदि का वर्णन करके दमयन्ती को समझाने का पूर्ण प्रयत्न किया। लेकिन दमयन्ती स्वर्ग के ऐश्वर्य तथा मरीचिका से तनिक भी प्रभावित नहीं हुई। राजा नल ने कहा, हे देवी! देवताओं को छोड़कर आपका मुझ मनुष्य को चाहना, कदापि उचित व तर्क-संगत नहीं है। अतः आप अपना मन उन्हीं में लगाओ। देवताओं को क्रोधित करने से मनुष्य की मृत्यु भी हो जाती है। अतः आपको मेरी बात मान लेनी चाहिए। यह सुनकर दमयन्ती डर गयी और उसके नेत्रों से अश्रुधरा प्रवाहित होने लगी। दमयन्ती कहने लगी, हे राजन्! मैं देवताओं को नतमस्तक होकर, मन में आपको ही अपना पति मानती हूँ। अब कोई दूसरा उपाय सोचने योग्य नहीं रहा। फिर भी राजा नल ने दमयन्ती को स्वयंवर में देवताओं को ही अपना वर चुनने का परामर्श दिया तथा वहाँ से विदा ली। लौटकर देवताओं को राजा नल ने समस्त वृतान्त कह सुनाया।स्वयंवर की सभा प्रारम्भ होने पर चारों देवता राजा नल के समान अपना ‘रूप’ धारण करके, राजन के पास बैठ गए। जब दमयन्ती वरमाला लेकर स्वयंवर-सभा में आयी तथा उसने राजा नल के समान पाँच पुरुषों को पदासीन देखा तो वह ‘नल’ को न पहचान सकी और अत्यन्त सोच में पड़ गई। उसे बड़ा दुःख हुआ। अन्त में उसने इस समस्या के समाधान के लिये देवताओं की शरण में जाने का निश्चय किया। दमयन्ती कहने लगी, हे परम-पूज्य देवगणों! आपको विदित ही है कि मैं पहले ही मन तथा वाणी से राजा नल को अपना पति-परमेश्वर स्वीकार कर चुकी हूँ। राजा नल की प्राप्ति के लिये मैं चिरकाल से तप तथा व्रत भी कर रही हूँ। अतः हे भगवन्! यदि मैं पतिव्रता हूँ तो मेरे सत्य के प्रताप से देवलोक के देवतागण मुझे मेरे राजा नल के दर्शन करा दें तथा ऐश्वर्यशाली देवतागण भी अपने आपको प्रकट करें, जिससे मैं नरपति नल को पहचान सकूं। पतिव्रता का तिरस्कार करने का साहस तो देवताओं को भी नहीं होता। दमयन्ती की इस प्रार्थना से प्रसन्न होकर देवताओं ने उसे ‘देवता’ तथा ‘मनुष्य’ में भेद करने की शक्ति प्रदान कर दी। उसने देखा कि पाँच में से चार पुरुषों के शरीर पर न तो पसीना है, न धूल है तथा उनके शरीर की ‘छाया’ पृथ्वी पर नहीं पड़ रही है और वे पृथ्वी को स्पर्श भी नहीं कर रहे हैं व उनकी माला के ‘पुष्प’ तनिक भी नहीं कुंभला रहे हैं। दमयन्ती ने सभी देवताओं को पहचानकर उन्हें प्रणाम किया। पाँचवे ‘पुरुष’ को जिसके शरीर पर कुछ धूल पड़ी थी, कुछ पसीना आ गया था व उसके शरीर की छाया भी पृथ्वी पर पड़ रही थी तथा वह भूमि को स्पर्श भी कर रहा था और उसकी माला के पुष्प कुछ कुंभला गये थे, दमयन्ती ने पहचान लिया कि ये ही राजा नल हैं। उसने तुरन्त उनके कंठ में जयमाला डाल दी। इस प्रकार अपनी दृढ़-निष्ठा तथा पतिव्रता के प्रभाव से, दमयन्ती ने पति रूप में राजा नल को ही प्राप्त किया। देवताओं ने प्रसन्न होकर दमयन्ती को आशीर्वाद दिया।सत्पुरुषों की कितनी सत्य-प्रतिज्ञा और दृढ़-निष्ठा होती है। जिस देवी-शक्ति ने स्वर्ग के सुख, ऐश्वर्य तथा भोगों को त्यागकर अपनी वाणी को तनिक भी न डगमगाने दिया और मनुष्य-जन्म धरण करने वाले राजा नल से ही विवाह किया, उस सतयुगी-देवी की परम्परा अर्थात् धरम-निष्ठा और पतिव्रता की व्याख्या, हम आज तक अर्थात् इस कलयुग में भी करते हैं।

भीम उत्सव था वहां, उसने कुन्दनपुरी राजधानी में,
संसार के सब भूप थे, उस स्वयंवर की शानी में।
भीम की थी सती सुन्दरी, वरमाला लिए हाथ में,
भूपों को थी देखती, लिए सखी सहेली साथ में।
मुकुट बांधे शीश थे, राजेश नल बैठे जहां,
हषिर्त हो दमयन्ती ने, डाली थी जयमाला वहां। ।।1।।

त्याग दिए स्वगार्दि भोग, दमयन्ती से देवगण विवाह करने आये थे,
निषध देश के स्वयंवर में, राजा नल भी वहां पर आये थे।
प्रतिज्ञा नहीं तोडी उसने, रीति ये रघुकुल की न्यारी,
त्याग हो तो एेसा हो, वचन से पीछे हटी ना नारी। ।।2।।

सती दमयन्ती को साथ लेकर, राजा नल सब चल दिए,
महाराज भीम सिगर ने आदर सहित, भूप सारे विदा किए।
नरवर अपने गढ में जाकर, फिर राज्य वो करने लगे,
सुख-चैन देकर अपनी प्रजा को, कष्ट उनका हरने लगे।
प्राचीन है राजधानी धाम, हेतराम हैं जन्मे यहां,
गुरुदेव इस कुन्दनपुरी नगरी का, पूरा हुआ है इमत्यहां ।।3।।

तेरी भूमि है उत्तम निर्मल, तीर्थ-धाम कहलाती है,
तेरे कुल की रीति यही है, प्रतिज्ञा पूर्ण कराती है।
बहे थी गंगा मां वहां पर, सत्पुरुषों की याद दिलाती थी,
देखकर वहां की तपोभूमि, हेतराम को नित्य रुलाती थी। ।।4।।

गुप्त प्रगट व सिद्ध-पुरुष, इस पुण्य-भूमि में विचरते हैं,
अर्द्ध्-रात्रि में अवन्तिका देवी की, नित्य प्रति वे पूजा करते हैं।
महापुरुष पतित-उद्धारक, आपको कोटि-कोटि हमारा प्रणाम,
योगी-सुत मां सोमती को देकर, आप गये परलोक धाम।
उन कालगुंजार योगेश्वर को, जल अंजुलि अर्पित कैसे करें,
इतना सामर्थ्य बल हम में नहीं, उनकी आराधना कैसे करें। ।।5।।

6 comments:

  1. बहुत बहुत आभार इस कहानी को पढ़वाने का !

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  2. Very nice work.Our glorious history is always readable and inspiring.

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  3. जय श्री श्री श्री दादा गुरुदेव जी महाराज...!

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  4. महा तपस्विनी माता दमयन्ती वह सत्यनिष्ठ महापुरूष राजा नल को मेरा शत-शत नमन । ऐसे प्रेरणा दायक इतिहास को दोहराने के लिए आपका ह्रदय से धन्यवाद ।

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